शनिवार, 15 सितंबर 2007

एक अधूरा सवाल

बाएँ कान को धीरे-धीरे खुजाते और नज़रें नीची रखते हुए उसने बेफीक्री से उससे पूछा "क्या बे, इससे पहले भी कभी किसी ढाबे-शाबे में काम कर है?" "करा है न! रामदेव के ढाबे में, वहीं पर पांच साल बर्तन मांजा करता था" उसने जवाब दिया. "ठीक है, चल शुरू कर दे. और देख ५० रूपैये रोज़ मिलेंगे और दो टेम का खाना, ठीक है?". उसने हामी में सर हिलाया और चुपचाप जाकर बर्तन माजने लग गया. बाएँ कान को खुजाने वाले ने गौर से उसकी तरफ देखा, वो चौदह पह्द्रह साल का मर्गिल्ला सा लड़का था, मगर उसके चेहरे पर एक कसैलापन था, निहायती ज़हरीला कसैलापन जैसे उसके चेहरे कि रगों में खून नही काला ज़हर बहता हो, केवल उसको देखने भर से बायाँ कान खुजाने वाले को मितली सी आने लगी सो उसने नज़र उसपर से हटाई और गल्ले पर बैठ कर सब्जी का हिसाब करने लगा. अचानक बाहर से बर्तनों के गिरने कि ज़ोरदार आवाज़ आई और उसके बाद वो आवाज़ चीख पुकार में बदल गयी. बायाँ कान खुजाने वाला दौड़ते दौड़ते बाहर आया. उसने देखा अभी अभी जो चोकर उसने बर्तन धोने के लिए रखा था उसने एक दूसरे काम करने वाले लडके को गिरेबान से पकड़ रखा है और उसके चेहरे पर ईंट के आधे टुकडे से वार कर रहा है. खून दूसरे लडके के सर के चारो तरफ से बगावत कर रह था और उस वक़्त यह अंदाजा लगना मुश्किल था कि वो चेहरे के किस हिस्से से फ़ुट रह है. बायाँ कान खुजाने वाला चिल्लाते हुए उन दोनो कि तरफ लपका, "क्या कर रहे हो भेन्चोदो?" वो गुस्से और डर में चिल्लाया. उसने पास जाकर बर्तन धोने वाले को दूसरे लडके के ऊपर से खीचा और घुमाकर एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके गाल में जड़ दिया. बर्तन धोने वाले लडके ने भी नेव्तोन के तीसरे नियम का पालन करते हुए अभी भी हाथ में पकडा हुआ ईंट उसके मुह्पर जड़ दिया. बायाँ कान खुजाने वाला नीचे गिर गया और उसके चेहरे से बेसाख्ता खून बहकर गंदली मिट्टी में कीचड़ बनाने लगा.
तीन घंटे बीत चुके थे और थाने के लगभग सभी लोग बर्तन धोने वाले लडके पर हाथ-सफ़ाई कि रस्म अदा कर चुके थे. उसकी शक्ल और उसका शरीर अब कुपोषण से छुटकारा पा चुके थे, मगर उसके चेहरे पर अभी भी वो ज़हर सही सलामत उसकी खाल के नीचे नाच रह था.
तीन घंटो के लंच टेम के बाद थानेदार वापिस अपनी कुर्सी पर पसर गया और अपने मात्हतो से लड़के के बारे में जानकारी लेने लगा. आधे-पौन घंटे तक जानकारी लेने के बाद वो लड़के से मुखातिब हुआ, "क्यो बे, कोई लौंडिया नही मिली तो खून कि सारी गर्मी खून से निकालेगा तू? हरामी भेन्चोद!" कहकर उसने एक ज़ोरदार ठोकर लडके के पेट में जड़ दी. लड़का हलके से कह्राया मगर उसके चेहरे से वो ज़हर नही गया. "बता क्यो मारा तुने उन्दोनो को?" थानेदार ने पूछा. लड़का चुपचाप पड़ा रह, कुछ बोला नही. इतनी मार अगर किसी घिसे हुए मुजरिम को भी पड़े तो वो भी अपनी पूरी खाल पलट दे, मगर इसने तो जैसे दर्द और डर से शर्त रखी हुयी हो कि मुझे हराओ तो जानू. वो पूरे दिन पिटता रह मगर कुछ नही बोला. एक चौदह-पन्द्राह साल के लडके के लिहाज से यह बर्तन धोने वाला खासा सख्त जान था.
वो रात भर बिना खाने-पीने के पड़ा रह. सुबह-सुबह जब हवालात कि सफ़ाई करने वाले ने दरवाजा खोला तो उससे ज़मीन पर आंखें बंद करके पड़ा हुआ पाया. उससे आराम से पड़ा हुआ जानकार सफ़ाई वाले ने नफरत से जूते का तला उसके चेहरे पर रगड़ा, "उठ हराम के जाये, अपनी माँ कि बरात में आया है साले." मगर उसने कोई हरक़त नही कि. उसकी खाल सफ़ेद पड़ चुकी थी, ज़िंदगी अपनी वसीयत में से उसका नाम मिटा चुकी थी.
दोपहर में पंचनामा भरने के बाद थानेदार ने बायाँ कान खुजाने वाले को थाने में बुलाया ताकि लडके के परिवारवालों के बारे में तफ्तीश कि जा सके. बायाँ कान खुजाने वाला बाएँ कान पर पट्टी पहन कर थाने में आया. आज वो कान नही अपनी दांयी जांघ के जोड़ को चुटकी में भर कर मसल रह था और आंखें मूँद कर उसका पूरा लुत्फ़ उठा रह था. "अबे दाद खुजाना बंद कर और यह बता अब इसकी बोडी का क्या करें" थानेदार ने उसे झिड़कते हुए पूछा. "करना क्या है फैंक दो साले को कहीं, हरामी ने शक्ल बिगाड़ दी मेरी" उसने ज़मीन पर पड़ी हुयी लाश को ठोकर लगते हुए कहा. उसकी ठोकर से लाश के ऊपर पड़ी हुयी चादर हट गयी और लडके का चेहरा नज़र आने लगा. अबकी बार जब दांयी जांघ का जोड़ खुजाने वाले ने लाश को देखा तो उसकी नज़रें लाश के चेहरे पर ठिटक गयी. ज़हर जा चूका था, और चेहरे पे खेलती हुयी मुस्कान यू थी मानो किसी बच्चे ने नींद में कोई सुनहरा सपना देखा हो. उससे वो बिल्कुल अपने उस बच्चे कि तरह लगा जिससे पैदा होने से पहले ही उसकी बीवी ने अपने आशिक के कहने पर पेट में ही मरवा दिया था. इससे प्यारा चेहरा दांयी जांघ का जोड़ खुजाने वाले ने कभी नही देखा था, उसका दिमाग सुन्न हो गया. उसने थानेदार से कहा, "यह वो नही साहब, यह तो कोई दूसरा बच्चा है, उसके चेहरे का ज़हर..." थानेदार का चेहरा बिगड़ गया जैसे किसी ने ज़बरदस्ती उसके मुँह में पालक कि सब्ज़ी ठूंस दी हो जोकि उससे कतई नापसंद थी, उसने एक झन्नाटेदार थप्पड़ दाई जांघ का जोड़ खुजाने वाले के मुह पर रसीद कर दिया और धक्के मारकर उसे थाने से बाहर फिकवा दिया. थानेदार बाक़ी कि कागजी कारवाही पूरी करने लगा मगर दाई जांघ का जोड़ खुजाने वाला कहीं नही गया वो थाने के बाहर खड़ा होकर दिन भर चिल्लाता रह "ज़हर नही है साहब, यह वो नही है, यह वो नही है..."