तुम्हे भी मेरी तरह
प्रेम के सुख से ज्यादा
उसका त्रास पसंद है
या शायद हमारे खून के
तत्वों को आदत हो गई है
नशे की
नशा किसी भी तरह का
मगर कम-से-कम
दिमाग को सुन्न कर दे
कुछ देर
और कसम से क्या मज़ा है
जैसा की कुछ छोटे जानवरों में होता है
उनमे होते हैं स्त्री और पुरूष दोनों के ही
प्रजनन अंग
और वो दोनों ही तरीको से
ले सकते हैं मिलन का सुख,
हमारे शरीर में भी शायद
प्रेम के सुख और दुःख
दोनों ही से
उपजता है आनंद
या शायद हमारे भीतर के
उस काले जानवर को
बेइन्तेहा प्यार है
प्यार के उस काले जानवर से
जो भी हो
फिर से कहता हूँ
मज़ा बहुत है कसम से।
शुक्रवार, 2 मई 2008
मंगलवार, 22 अप्रैल 2008
रोद्रिगुएस और गब्रिएला की गब्रिएला को
तुम्हारी उंगलियाँ
रूह बनकर दौड़ती हैं
गिटार के मुर्दा फ्रेट-बोर्ड पर
और संगीत के जिस्म में
जान आती है।
तुम्हारे आवारा बाल
सताते हैं सुरों को
मगर सुर
बड़े भाइयों की तरह
सारी बदमाशियां सहन करते हैं
बालों की
शांत सहज अपनी जगह पर।
काफ़ी देर बाद नज़र गई
तुम्हारे चेहरे पर
जो पहली बार उम्मीद के मुताबिक
खूबसूरत ही था।
रूह बनकर दौड़ती हैं
गिटार के मुर्दा फ्रेट-बोर्ड पर
और संगीत के जिस्म में
जान आती है।
तुम्हारे आवारा बाल
सताते हैं सुरों को
मगर सुर
बड़े भाइयों की तरह
सारी बदमाशियां सहन करते हैं
बालों की
शांत सहज अपनी जगह पर।
काफ़ी देर बाद नज़र गई
तुम्हारे चेहरे पर
जो पहली बार उम्मीद के मुताबिक
खूबसूरत ही था।
बुधवार, 26 मार्च 2008
पहाडी प्रेम
एक पहाडी मोड़ पर
आ कर रूकती है एक बस
और एक बीवी और दो बच्चो को पीछे छोड़
आगे बढ जाती है
बीवी, जो इंतज़ार में
इतना रम चुकी थी
की मिलन से उसकी
दिनचर्या टूट गई
जो अब फिर से
सुचारू हो जायेगी
बेटा अभी भी थामे हुए है
आनंद विहार से लायी हुयी
एक छोटी सी खिलौना कार
जिसका पहिया भी टूट चुका है
उसके सामने के दांतों की तरह
उसको बाबू के जाने का दुःख नही
बल्कि खुशी है
अगली बार शायद
कोई दूसरा दिलचस्प खिलौना लाये
बेटी, जो अब फ्रोक्क पहनने लगी है
उसी फ्रोक्क से पोछती है, अपनी नाक
और माँ का रोने में
साथ देती है
रोना, जो विदाई की वजह से नही
महज औपचारिकता है
इतना समय कहाँ है
जो रोने में व्यर्थ किया जा सके
बूङे सास-ससुर हैं
सूखते हुए खेत और जानवर हैं
नौले हैं, जंगल हैं
अगली बार जब फिर से लौटेगी
वो संवेदानाओ से कांपती
पहाड़ी बस
१५-२० दिन फिर ख़राब हो जायेंगे, कहा!
आ कर रूकती है एक बस
और एक बीवी और दो बच्चो को पीछे छोड़
आगे बढ जाती है
बीवी, जो इंतज़ार में
इतना रम चुकी थी
की मिलन से उसकी
दिनचर्या टूट गई
जो अब फिर से
सुचारू हो जायेगी
बेटा अभी भी थामे हुए है
आनंद विहार से लायी हुयी
एक छोटी सी खिलौना कार
जिसका पहिया भी टूट चुका है
उसके सामने के दांतों की तरह
उसको बाबू के जाने का दुःख नही
बल्कि खुशी है
अगली बार शायद
कोई दूसरा दिलचस्प खिलौना लाये
बेटी, जो अब फ्रोक्क पहनने लगी है
उसी फ्रोक्क से पोछती है, अपनी नाक
और माँ का रोने में
साथ देती है
रोना, जो विदाई की वजह से नही
महज औपचारिकता है
इतना समय कहाँ है
जो रोने में व्यर्थ किया जा सके
बूङे सास-ससुर हैं
सूखते हुए खेत और जानवर हैं
नौले हैं, जंगल हैं
अगली बार जब फिर से लौटेगी
वो संवेदानाओ से कांपती
पहाड़ी बस
१५-२० दिन फिर ख़राब हो जायेंगे, कहा!
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