तुम्हारी उंगलियाँ
रूह बनकर दौड़ती हैं
गिटार के मुर्दा फ्रेट-बोर्ड पर
और संगीत के जिस्म में
जान आती है।
तुम्हारे आवारा बाल
सताते हैं सुरों को
मगर सुर
बड़े भाइयों की तरह
सारी बदमाशियां सहन करते हैं
बालों की
शांत सहज अपनी जगह पर।
काफ़ी देर बाद नज़र गई
तुम्हारे चेहरे पर
जो पहली बार उम्मीद के मुताबिक
खूबसूरत ही था।
मंगलवार, 22 अप्रैल 2008
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