तुम्हे भी मेरी तरह
प्रेम के सुख से ज्यादा
उसका त्रास पसंद है
या शायद हमारे खून के
तत्वों को आदत हो गई है
नशे की
नशा किसी भी तरह का
मगर कम-से-कम
दिमाग को सुन्न कर दे
कुछ देर
और कसम से क्या मज़ा है
जैसा की कुछ छोटे जानवरों में होता है
उनमे होते हैं स्त्री और पुरूष दोनों के ही
प्रजनन अंग
और वो दोनों ही तरीको से
ले सकते हैं मिलन का सुख,
हमारे शरीर में भी शायद
प्रेम के सुख और दुःख
दोनों ही से
उपजता है आनंद
या शायद हमारे भीतर के
उस काले जानवर को
बेइन्तेहा प्यार है
प्यार के उस काले जानवर से
जो भी हो
फिर से कहता हूँ
मज़ा बहुत है कसम से।
शुक्रवार, 2 मई 2008
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