बुधवार, 22 अप्रैल 2009

भूख की लाश

कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश

नदी के किनारे रखी हुयी
सफेदी के कब्जे में,
कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश

और भी दुखद हो सकता है उसका होना
अगर मौत की वजह भूख हो

भूख
जो
बना सकती है
कवियों की कल्पना को
चित्रों के रंगों को
और जीवन की सभी खूबसूरत चीज़ों को
नदी के किनारे रखी हुयी
एक दुखद लाश,
मांस और हड्डियों का
बेजान ढेर

एक ढेर जो कभी लड़ता था
दूसरे ढेरों से
ज़िन्दगी की लड़ाई
एक ढेर जो आख़िर हार ही गया
और एक दूसरा ढेर जी लेगा
एक और दिन
मौत सी ज़िन्दगी

और मेरे बिना किसी सारोकार के भी
हर रोज़ मेरे सीने में
कोई आकर रख जाता है
ऐसी ही २५००० लाशें
एक दिन पहले तक
बोलती-फिरती
जिंदा लाशें

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

राहत की राहत















तुम्हारे गले से निकलता है
झरना
सपाट-शांत सुरों के
पानी का

सपाट इतना की
सतह पर सख्त जान पड़ता है
फिसलता जाता हूँ
बहते हुए

मुक्त छलांग की उत्तेजना
असीमता का उत्साह
और भीगाती हर बार
ठंडी फुहार

सींचता है
इसका पानी
गर्म आवेग की
नर्म जड़ों को

कभी-कभार
रखकर इसकी खट्टी-मीठी बूँदें
अपनी जीभ पर
मैं भी चखता हूँ
इसका स्वाद.

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

सुबहें (शुन्तारो तानिकावा से माफ़ी के साथ)

सुबह होती है
क्योंकि बच्चे हंसते हैं.
बच्चे हंसते हैं
क्योंकि धूप में चमकते हैं
रंगीन गुब्बारे.
गुब्बारे चमकते हैं
क्योंकि ताज़ा बन रही चाय
लगाती है भाप का लोशन उनपर.

ताज़ा बनती है चाय
क्योंकि हर सुबह ठीक ९:३० पर छूटती है फास्ट लोकल
ताकि चलता रहे काम

होती रहें सुबहें
और हंसते रहे
गुब्बारों को देख
ललचाते बच्चे

क्योंकि जब हंसते हैं बच्चे
सुबह होती हैं
सबसे ख़ूबसूरत