कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश
नदी के किनारे रखी हुयी
सफेदी के कब्जे में,
कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश
और भी दुखद हो सकता है उसका होना
अगर मौत की वजह भूख हो
भूख
जो
बना सकती है
कवियों की कल्पना को
चित्रों के रंगों को
और जीवन की सभी खूबसूरत चीज़ों को
नदी के किनारे रखी हुयी
एक दुखद लाश,
मांस और हड्डियों का
बेजान ढेर
एक ढेर जो कभी लड़ता था
दूसरे ढेरों से
ज़िन्दगी की लड़ाई
एक ढेर जो आख़िर हार ही गया
और एक दूसरा ढेर जी लेगा
एक और दिन
मौत सी ज़िन्दगी
और मेरे बिना किसी सारोकार के भी
हर रोज़ मेरे सीने में
कोई आकर रख जाता है
ऐसी ही २५००० लाशें
एक दिन पहले तक
बोलती-फिरती
जिंदा लाशें
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
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