
तुम्हारे गले से निकलता है
झरना
सपाट-शांत सुरों के
पानी का
सपाट इतना की
सतह पर सख्त जान पड़ता है
फिसलता जाता हूँ
बहते हुए
मुक्त छलांग की उत्तेजना
असीमता का उत्साह
और भीगाती हर बार
ठंडी फुहार
सींचता है
इसका पानी
गर्म आवेग की
नर्म जड़ों को
कभी-कभार
रखकर इसकी खट्टी-मीठी बूँदें
अपनी जीभ पर
मैं भी चखता हूँ
इसका स्वाद.

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