बुधवार, 31 अक्टूबर 2007

प्यार

वो नज़रें...
जब भी देखती है मुझे वो नज़रें
मैं सहम सा जाता हू
खुद को ज़िन्दा रखने कि लड़ाई,
मेरे रोम रोम से ठीथर कर
बाहर आने लगती है


मैं मरना नही चाहता
और इसकी वजह
मेरा डर नहीं
मगर मुझे बारहा मरने से परहेज़ है

अब अगर मुझे देखेंगी
वो मासूम, प्यार भरी, शरारती आंखें
मैं नज़र फेर लूंगा

कसम से!

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2007

विदा

मुझे कभी भी अच्छा नही लगता
तुम्हारा जाना
तुम्हारे साथ मुलाक़ात
चाहे छोटी हो या बड़ी,
मेरे समय और गति के समीकरण में
घालमेल कर देती है
और मैं भूल जाता हू
कि तुम कल आई थी या परसों

और मुझे सख्त परहेज है
सामान लदवाने कि
और तुम्हे छोड़ कर आने कि
उस पूरी कवायद से,
तुम्हारे सामान जितना भारी
मेरी यादो का एक बड़ा टुकडा
तुम हमेशा अपने साथ ले जाती हो
और मेरी हालत ऐसी होती है
जैसे
मेहनत कि कमाई से
किसी ने सर्विस टेक्स काट लिया हो

अब कम-से-कम
मुझसे स्टेशन तक
छोड़ आने कि ज़िद न करो
जहाँ हमेशा
तुम्हारी गाड़ी के जाने के बाद
मैं हो जाता हूँ
स्टेशन ही जितना खाली