वो नज़रें...
जब भी देखती है मुझे वो नज़रें
मैं सहम सा जाता हू
खुद को ज़िन्दा रखने कि लड़ाई,
मेरे रोम रोम से ठीथर कर
बाहर आने लगती है
मैं मरना नही चाहता
और इसकी वजह
मेरा डर नहीं
मगर मुझे बारहा मरने से परहेज़ है
अब अगर मुझे देखेंगी
वो मासूम, प्यार भरी, शरारती आंखें
मैं नज़र फेर लूंगा
कसम से!
बुधवार, 31 अक्टूबर 2007
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1 टिप्पणी:
hey very intense man!!!! nice poem...seems there's a deep wound in some1's heart...then only one can write such things....ekdum 'dil se'...good one! keep it up!
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