और ठीक इस कविता को लिखने से पहले
सूख गया शब्दों का
घड़ा मेरे भीतर
सनसनाते दिमाग में
ख्यालों की उथल-पुथल के बीच
दौड़ने लगे हाथी-घोड़े
बेसबाल खेलते फिरंगी बच्चे
और सात साल खुजलाने के बाद
एक आदिम मादा को छोड़ कर जाता एक आदिम नर
ख्यालों का बेरोक-टोक प्रवाह
किस कदर होता होगा
कैसी होती होगी
दमन की दबी हुयी आग
कैसा होता होगा
लिखना आक्रोश में
और प्रेम में भी
कुछ भी याद नहीं आता
ज़िन्दगी में मुफ्त नहीं कुछ भी
कीमत हर चीज़ की
प्यार की, आराम की, सहूलियत की,
भरोसे की, शान्ति की, दया की, मर्म की
और सोच की भी
जिसे चुकाया जाता है
शायद सोच से ही
बुधवार, 3 जून 2009
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