
फ़ोन उठाते ही गूंजती है
एक पहाड़ी नदी की कलकल,
हंसती हुयी बर्फ
सुनाई देती है
कान और जुबां के बीच से
निकल जाता है दिमाग
और तेरी मेरी ज़बान समझने वाला
दिल आ जाता है
बात क्या होती है?
शब्दों के बीच के सन्नाटे में
देवदार की ठंडक,
कुछ हाँ, हूँ,
और फिर
एक पहाड़ी नदी की कलकल
हंसती हुयी बर्फ सुनाई देती है
ओड़ना मत, कुछ भी
किसी का दिया हुआ
ये सोना खरा है,
यहाँ दोष परखने वाले का है
और फ़िक्र न करियो
तुझे सम्हाल के रखा है मैंने
अपनी दोनों हथेलियों के बीच में
और तुझ पर से गुज़रती है
वो लकीर
जिसमे कहते हैं की
दिल नज़र आता है
