मंगलवार, 31 मार्च 2009

पंकज खिलता रहे


फ़ोन उठाते ही गूंजती है
एक पहाड़ी नदी की कलकल,
हंसती हुयी बर्फ
सुनाई देती है

कान और जुबां के बीच से
निकल जाता है दिमाग
और तेरी मेरी ज़बान समझने वाला
दिल आ जाता है

बात क्या होती है?
शब्दों के बीच के सन्नाटे में
देवदार की ठंडक,
कुछ हाँ, हूँ,
और फिर
एक पहाड़ी नदी की कलकल
हंसती हुयी बर्फ सुनाई देती है

ओड़ना मत, कुछ भी
किसी का दिया हुआ
ये सोना खरा है,
यहाँ दोष परखने वाले का है

और फ़िक्र न करियो
तुझे सम्हाल के रखा है मैंने
अपनी दोनों हथेलियों के बीच में
और तुझ पर से गुज़रती है
वो लकीर
जिसमे कहते हैं की
दिल नज़र आता है

बुधवार, 25 मार्च 2009

उनींदी सुबहें

मेरी सुबह
उसकी आंखों में सोती हैं
पलकों पर फैली जाती है
गुज़री हुयी रात
ख्यालो से बिखरे बाल
और छु लूँ जो कभी यूं ही
तो हंस पड़ती है
नींद में भी

यूं ही देखता रहूँ
तुझे सोते हुए
और गुज़रती रहे ज़िन्दगी
बंद पलकों की सुबहों में।

तुम्हे चाहने से ना चाहने तक

तुम्हे चाहने से ना चाहने तक
मैं एक सदी की दूरी तय करता हूँ
नितांत अकेले
भटकता हुआ
खामोश प्रेमगीतों में

छुप के सुनता हूँ
जुगनुओं की आवाजें
रात के आसमान में जगमगाती हुयी
और दूर कहीं गूंजती हुयी
आँखों की बदमाश हंसी

इस सफ़र की शुरुआत नहीं कोई
ना कोई आखिरी पड़ाव
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान से शुरू होता है ये
तुम्हारी सर्द बेरुखी पर ख़त्म

कैसा सच है यह
यकीनन झूठ जैसा
और झूठ है अगर तो
मुझे यकीन है इसके सच पर

अगर मुझे मारना चाहते हो तो

बुझा दो
जो जलता है.
रोशनी के लिए
ढूँढो दिए के नीचे

घोंट दो गला उस आवाज़ का
जो तुम्हारी आवाज़ से नहीं मिलती
और मिटा दो वो सबकुछ
जिससे देखने के लिए तुम्हे आँखें उधार लेनी पड़ती हैं

सच हमेशा एहसान की तरह होता है
जो दूसरे पर किया जाता है
और इसलिए देने वाला लेने वाले से बड़ा हो जाता है

मुझे मारो मगर सच से
वरना तुम्हारी झूठ की गोली को फाड़ कर
तुम्हारी आत्मा को नंगा करने का
माद्दा अभी भी है मेरे पास

मूंछ कविता

मेरी मूंछें
मेरे ख्यालों की तरह ही
बेतरतीब हैं.

मेरे अस्तित्व का हिस्सा
अपने अलग अस्तित्व के साथ

ये
प्रोटीन कि पैदाइश हैं.
और मुझे शक है
कि प्रोटीन से मेरे परहेज की वजह से
इन्होने इसकी तस्करी का
निकाला है कोई नया तरीका
ताकि फलती फूलती रहे ये
लोकतंत्र में नक्सलवाद कि तरह

कभी-कभी
इनमे से एक-दो सिपाही
झुकने से मना कर देते हैं
और खड़े होकर बजा देते हैं
क्रान्ति का बिगुल
पर चूंकि मासूम हैं
इसीलिए प्यार से दुलारने पर
शांत होकर बैठ भी जाते हैं

अजब है इनकी सांठ-गाँठ,
बहला फुसला कर इन्होने
एक होंठ भी मिला लिया है
अपने साथ
जो अब नज़रें चुराता फिरता है मुझसे
अगर मैं कुछ वक़्त और
इन्हें करने दूं इनकी मनमानी
तो मेरे चेहरे के ज्यादातर भूगोल पर
जमा लेंगी यह अपना कब्ज़ा
अफगानिस्तान में तालिबान कि तरह

एक लबादे कि तरह
ओड़े रहता हूँ इन्हें
ताकि बचा रहूँ
उन आँखों से
जिनकी होती है आदत
दूसरों के चेहरों में अपना अक्स देखने की.

ज़िन्दगी

छन्नू बाबा की कजरी
पान वाली खराशी मिठास

जो सत्रियानी का गिटार
अभिव्यक्ति के आवेग की सुरीली-बेसुरी चीख

बम्बई का ट्रैफिक
सुबह ७:३० बजे और ९:३० बजे

बनाने का सुख
छोड़ने के दुःख

चूमना किसी सोते हुए बच्चे को
और संतोष सटीक सुर का

समंदर किनारे शाम की हवा
तीन दिन की लगातार बारिश

अल-सुबह की अधूरी नींद
पूरी रात का अधूरा मंथन

बेवजह की कविता
वजह का असमंजस

हवा जैसा पिता का प्यार
फटकार जैसी माँ की फ़िक्र

जैसे राखी पर मिलना
धागे के साथ बहिन की चिट्ठी
और कटना बिजली का
उससे पढ़ने से पहले

एक गुलाब है
कांटो वाला
जो रंग बदलता हैं
धूप के साथ