मेरी मूंछें
मेरे ख्यालों की तरह ही
बेतरतीब हैं.
मेरे अस्तित्व का हिस्सा
अपने अलग अस्तित्व के साथ
ये
प्रोटीन कि पैदाइश हैं.
और मुझे शक है
कि प्रोटीन से मेरे परहेज की वजह से
इन्होने इसकी तस्करी का
निकाला है कोई नया तरीका
ताकि फलती फूलती रहे ये
लोकतंत्र में नक्सलवाद कि तरह
कभी-कभी
इनमे से एक-दो सिपाही
झुकने से मना कर देते हैं
और खड़े होकर बजा देते हैं
क्रान्ति का बिगुल
पर चूंकि मासूम हैं
इसीलिए प्यार से दुलारने पर
शांत होकर बैठ भी जाते हैं
अजब है इनकी सांठ-गाँठ,
बहला फुसला कर इन्होने
एक होंठ भी मिला लिया है
अपने साथ
जो अब नज़रें चुराता फिरता है मुझसे
अगर मैं कुछ वक़्त और
इन्हें करने दूं इनकी मनमानी
तो मेरे चेहरे के ज्यादातर भूगोल पर
जमा लेंगी यह अपना कब्ज़ा
अफगानिस्तान में तालिबान कि तरह
एक लबादे कि तरह
ओड़े रहता हूँ इन्हें
ताकि बचा रहूँ
उन आँखों से
जिनकी होती है आदत
दूसरों के चेहरों में अपना अक्स देखने की.
बुधवार, 25 मार्च 2009
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