तुम्हे चाहने से ना चाहने तक
मैं एक सदी की दूरी तय करता हूँ
नितांत अकेले
भटकता हुआ
खामोश प्रेमगीतों में
छुप के सुनता हूँ
जुगनुओं की आवाजें
रात के आसमान में जगमगाती हुयी
और दूर कहीं गूंजती हुयी
आँखों की बदमाश हंसी
इस सफ़र की शुरुआत नहीं कोई
ना कोई आखिरी पड़ाव
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान से शुरू होता है ये
तुम्हारी सर्द बेरुखी पर ख़त्म
कैसा सच है यह
यकीनन झूठ जैसा
और झूठ है अगर तो
मुझे यकीन है इसके सच पर
बुधवार, 25 मार्च 2009
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