बुधवार, 25 मार्च 2009

उनींदी सुबहें

मेरी सुबह
उसकी आंखों में सोती हैं
पलकों पर फैली जाती है
गुज़री हुयी रात
ख्यालो से बिखरे बाल
और छु लूँ जो कभी यूं ही
तो हंस पड़ती है
नींद में भी

यूं ही देखता रहूँ
तुझे सोते हुए
और गुज़रती रहे ज़िन्दगी
बंद पलकों की सुबहों में।

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