बुधवार, 3 जून 2009

राइटर्स ब्लाक

और ठीक इस कविता को लिखने से पहले
सूख गया शब्दों का
घड़ा मेरे भीतर

सनसनाते दिमाग में
ख्यालों की उथल-पुथल के बीच
दौड़ने लगे हाथी-घोड़े
बेसबाल खेलते फिरंगी बच्चे
और सात साल खुजलाने के बाद
एक आदिम मादा को छोड़ कर जाता एक आदिम नर

ख्यालों का बेरोक-टोक प्रवाह
किस कदर होता होगा
कैसी होती होगी
दमन की दबी हुयी आग
कैसा होता होगा
लिखना आक्रोश में
और प्रेम में भी
कुछ भी याद नहीं आता

ज़िन्दगी में मुफ्त नहीं कुछ भी
कीमत हर चीज़ की
प्यार की, आराम की, सहूलियत की,
भरोसे की, शान्ति की, दया की, मर्म की
और सोच की भी
जिसे चुकाया जाता है
शायद सोच से ही

बुधवार, 27 मई 2009

इक रब्त

किस-किस से मिलते, किस-किस के हो पाते
जब तेरे न हुए हम तो फिर किसके हो पाते

दिन ख्वाहिशों में गुज़रे और शब इंतज़ार में
ख़्वाब जो देखे होते वो ख़्वाब तो मिरे हो पाते

आरज़ू आसमानों की थी खूँ दर-फकीरों की
कही ग़ज़ल इश्क़ किया क्यूँ काम के हो पाते

वक़्त बदला ही नहीं थम सा गया उसके बाद
वस्ल को गुज़रे वरनअ कुछ साल तो हो पाते

उम्र बीतेगी इसी रौ में कोई गिला भी नहीं
ख़लिश के नज़ारे तेरे और क़रीब हो पाते

"लोक" होता जो खुदा इतनी तो कोशिश करता
लफ्ज़ भूल के तमन्ना एक रात सुख़न हो पाते

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

भूख की लाश

कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश

नदी के किनारे रखी हुयी
सफेदी के कब्जे में,
कितनी दुखद हो सकती है
एक लाश

और भी दुखद हो सकता है उसका होना
अगर मौत की वजह भूख हो

भूख
जो
बना सकती है
कवियों की कल्पना को
चित्रों के रंगों को
और जीवन की सभी खूबसूरत चीज़ों को
नदी के किनारे रखी हुयी
एक दुखद लाश,
मांस और हड्डियों का
बेजान ढेर

एक ढेर जो कभी लड़ता था
दूसरे ढेरों से
ज़िन्दगी की लड़ाई
एक ढेर जो आख़िर हार ही गया
और एक दूसरा ढेर जी लेगा
एक और दिन
मौत सी ज़िन्दगी

और मेरे बिना किसी सारोकार के भी
हर रोज़ मेरे सीने में
कोई आकर रख जाता है
ऐसी ही २५००० लाशें
एक दिन पहले तक
बोलती-फिरती
जिंदा लाशें

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

राहत की राहत















तुम्हारे गले से निकलता है
झरना
सपाट-शांत सुरों के
पानी का

सपाट इतना की
सतह पर सख्त जान पड़ता है
फिसलता जाता हूँ
बहते हुए

मुक्त छलांग की उत्तेजना
असीमता का उत्साह
और भीगाती हर बार
ठंडी फुहार

सींचता है
इसका पानी
गर्म आवेग की
नर्म जड़ों को

कभी-कभार
रखकर इसकी खट्टी-मीठी बूँदें
अपनी जीभ पर
मैं भी चखता हूँ
इसका स्वाद.

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

सुबहें (शुन्तारो तानिकावा से माफ़ी के साथ)

सुबह होती है
क्योंकि बच्चे हंसते हैं.
बच्चे हंसते हैं
क्योंकि धूप में चमकते हैं
रंगीन गुब्बारे.
गुब्बारे चमकते हैं
क्योंकि ताज़ा बन रही चाय
लगाती है भाप का लोशन उनपर.

ताज़ा बनती है चाय
क्योंकि हर सुबह ठीक ९:३० पर छूटती है फास्ट लोकल
ताकि चलता रहे काम

होती रहें सुबहें
और हंसते रहे
गुब्बारों को देख
ललचाते बच्चे

क्योंकि जब हंसते हैं बच्चे
सुबह होती हैं
सबसे ख़ूबसूरत

मंगलवार, 31 मार्च 2009

पंकज खिलता रहे


फ़ोन उठाते ही गूंजती है
एक पहाड़ी नदी की कलकल,
हंसती हुयी बर्फ
सुनाई देती है

कान और जुबां के बीच से
निकल जाता है दिमाग
और तेरी मेरी ज़बान समझने वाला
दिल आ जाता है

बात क्या होती है?
शब्दों के बीच के सन्नाटे में
देवदार की ठंडक,
कुछ हाँ, हूँ,
और फिर
एक पहाड़ी नदी की कलकल
हंसती हुयी बर्फ सुनाई देती है

ओड़ना मत, कुछ भी
किसी का दिया हुआ
ये सोना खरा है,
यहाँ दोष परखने वाले का है

और फ़िक्र न करियो
तुझे सम्हाल के रखा है मैंने
अपनी दोनों हथेलियों के बीच में
और तुझ पर से गुज़रती है
वो लकीर
जिसमे कहते हैं की
दिल नज़र आता है

बुधवार, 25 मार्च 2009

उनींदी सुबहें

मेरी सुबह
उसकी आंखों में सोती हैं
पलकों पर फैली जाती है
गुज़री हुयी रात
ख्यालो से बिखरे बाल
और छु लूँ जो कभी यूं ही
तो हंस पड़ती है
नींद में भी

यूं ही देखता रहूँ
तुझे सोते हुए
और गुज़रती रहे ज़िन्दगी
बंद पलकों की सुबहों में।

तुम्हे चाहने से ना चाहने तक

तुम्हे चाहने से ना चाहने तक
मैं एक सदी की दूरी तय करता हूँ
नितांत अकेले
भटकता हुआ
खामोश प्रेमगीतों में

छुप के सुनता हूँ
जुगनुओं की आवाजें
रात के आसमान में जगमगाती हुयी
और दूर कहीं गूंजती हुयी
आँखों की बदमाश हंसी

इस सफ़र की शुरुआत नहीं कोई
ना कोई आखिरी पड़ाव
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान से शुरू होता है ये
तुम्हारी सर्द बेरुखी पर ख़त्म

कैसा सच है यह
यकीनन झूठ जैसा
और झूठ है अगर तो
मुझे यकीन है इसके सच पर

अगर मुझे मारना चाहते हो तो

बुझा दो
जो जलता है.
रोशनी के लिए
ढूँढो दिए के नीचे

घोंट दो गला उस आवाज़ का
जो तुम्हारी आवाज़ से नहीं मिलती
और मिटा दो वो सबकुछ
जिससे देखने के लिए तुम्हे आँखें उधार लेनी पड़ती हैं

सच हमेशा एहसान की तरह होता है
जो दूसरे पर किया जाता है
और इसलिए देने वाला लेने वाले से बड़ा हो जाता है

मुझे मारो मगर सच से
वरना तुम्हारी झूठ की गोली को फाड़ कर
तुम्हारी आत्मा को नंगा करने का
माद्दा अभी भी है मेरे पास

मूंछ कविता

मेरी मूंछें
मेरे ख्यालों की तरह ही
बेतरतीब हैं.

मेरे अस्तित्व का हिस्सा
अपने अलग अस्तित्व के साथ

ये
प्रोटीन कि पैदाइश हैं.
और मुझे शक है
कि प्रोटीन से मेरे परहेज की वजह से
इन्होने इसकी तस्करी का
निकाला है कोई नया तरीका
ताकि फलती फूलती रहे ये
लोकतंत्र में नक्सलवाद कि तरह

कभी-कभी
इनमे से एक-दो सिपाही
झुकने से मना कर देते हैं
और खड़े होकर बजा देते हैं
क्रान्ति का बिगुल
पर चूंकि मासूम हैं
इसीलिए प्यार से दुलारने पर
शांत होकर बैठ भी जाते हैं

अजब है इनकी सांठ-गाँठ,
बहला फुसला कर इन्होने
एक होंठ भी मिला लिया है
अपने साथ
जो अब नज़रें चुराता फिरता है मुझसे
अगर मैं कुछ वक़्त और
इन्हें करने दूं इनकी मनमानी
तो मेरे चेहरे के ज्यादातर भूगोल पर
जमा लेंगी यह अपना कब्ज़ा
अफगानिस्तान में तालिबान कि तरह

एक लबादे कि तरह
ओड़े रहता हूँ इन्हें
ताकि बचा रहूँ
उन आँखों से
जिनकी होती है आदत
दूसरों के चेहरों में अपना अक्स देखने की.