शुक्रवार, 2 मई 2008

प्रेम में नीरज के लिए और शायद मेरे लिए भी

तुम्हे भी मेरी तरह
प्रेम के सुख से ज्यादा
उसका त्रास पसंद है
या शायद हमारे खून के
तत्वों को आदत हो गई है
नशे की

नशा किसी भी तरह का
मगर कम-से-कम
दिमाग को सुन्न कर दे
कुछ देर
और कसम से क्या मज़ा है


जैसा की कुछ छोटे जानवरों में होता है
उनमे होते हैं स्त्री और पुरूष दोनों के ही
प्रजनन अंग
और वो दोनों ही तरीको से
ले सकते हैं मिलन का सुख,
हमारे शरीर में भी शायद
प्रेम के सुख और दुःख
दोनों ही से
उपजता है आनंद

या शायद हमारे भीतर के
उस काले जानवर को
बेइन्तेहा प्यार है
प्यार के उस काले जानवर से
जो भी हो
फिर से कहता हूँ
मज़ा बहुत है कसम से।

कोई टिप्पणी नहीं: