बुधवार, 27 मई 2009

इक रब्त

किस-किस से मिलते, किस-किस के हो पाते
जब तेरे न हुए हम तो फिर किसके हो पाते

दिन ख्वाहिशों में गुज़रे और शब इंतज़ार में
ख़्वाब जो देखे होते वो ख़्वाब तो मिरे हो पाते

आरज़ू आसमानों की थी खूँ दर-फकीरों की
कही ग़ज़ल इश्क़ किया क्यूँ काम के हो पाते

वक़्त बदला ही नहीं थम सा गया उसके बाद
वस्ल को गुज़रे वरनअ कुछ साल तो हो पाते

उम्र बीतेगी इसी रौ में कोई गिला भी नहीं
ख़लिश के नज़ारे तेरे और क़रीब हो पाते

"लोक" होता जो खुदा इतनी तो कोशिश करता
लफ्ज़ भूल के तमन्ना एक रात सुख़न हो पाते

1 टिप्पणी:

Bhavesh Pandey ने कहा…

sahi naam rakha hai sir....
or ghajal b jagah par pahuchi hai...
dua karta hu vo jaalim b padhe jiske liye likhi...