आ कर रूकती है एक बस
और एक बीवी और दो बच्चो को पीछे छोड़
आगे बढ जाती है
बीवी, जो इंतज़ार में
इतना रम चुकी थी
की मिलन से उसकी
दिनचर्या टूट गई
जो अब फिर से
सुचारू हो जायेगी
बेटा अभी भी थामे हुए है
आनंद विहार से लायी हुयी
एक छोटी सी खिलौना कार
जिसका पहिया भी टूट चुका है
उसके सामने के दांतों की तरह
उसको बाबू के जाने का दुःख नही
बल्कि खुशी है
अगली बार शायद
कोई दूसरा दिलचस्प खिलौना लाये
बेटी, जो अब फ्रोक्क पहनने लगी है
उसी फ्रोक्क से पोछती है, अपनी नाक
और माँ का रोने में
साथ देती है
रोना, जो विदाई की वजह से नही
महज औपचारिकता है
इतना समय कहाँ है
जो रोने में व्यर्थ किया जा सके
बूङे सास-ससुर हैं
सूखते हुए खेत और जानवर हैं
नौले हैं, जंगल हैं
अगली बार जब फिर से लौटेगी
वो संवेदानाओ से कांपती
पहाड़ी बस
१५-२० दिन फिर ख़राब हो जायेंगे, कहा!

1 टिप्पणी:
bahut khoob..........yehi sach hai......
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